क्या है गठिया(Gout)?

क्या है गठिया?

गठिया को हम आम भाषा में “जोड़ो का दर्द” कहते है। दरअसल मेडिकल भाषा में जब हड्डियों के जोडो़ में यूरिक एसिड इकठ्ठा होने लगता है तब वह गठिया कहलाता है। इसके साथ ही जोड़ों में दर्द, अकड़न, सूजन, गांठ और शूल चुभने जैसी पीड़ा उत्पन होने लगती है।

Gout

अर्थराइटिस के प्रकार

  • रूमेटॉयड अर्थराइटिस: यह बहुत अधिक पाया जाने वाला गठिया का गंभीर रूप है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली उपास्थि (ऊतक जोड़ों को एक साथ जोड़ती है) पर हमला करती है।
  • सोराइटिक अर्थराइटिस: अर्थराइटिस के दर्द का यह रूप प्रायः सोरायसिस नामक त्वचा संक्रमण के कारण होता है जो  समय पर इलाज न होने पर काफी घातक और लाइलाज हो जाती है।
  • ओस्टियोसोराइसिस: यह बीमारी आनुवांशिक हो सकता है जो नसों और अस्थिरज्जु, उपास्थि और जोड़ो की अंतर्निहित हड्डियों पर बुरा प्रभाव डालता है। । यह उम्र बीतने के साथ प्रकट होता है। यह बीमारी अक्सर  शरीर का भार सहन करने वाले अंगों जैसे पीठ, कमर, घुटना, रीढ़, अंगूठे का जोड़ और पैर की अंगुलियों को प्रभावित करता है।
  • पोलिमायलगिया रूमेटिका: यह गठिया का प्रकार अक्सर 50 साल की आयु पार कर चुके लोगों में होता है। इसमें गर्दन, कंधा और कमर में असहनीय पीड़ा होने के साथ साथ इन अंगों को घुमाने में कठिनाई होती है।
  • एनकायलाजिंग स्पोंडिलाइटिस: यह सामान्यत: पीठ और शरीर के निचले हिस्से के जोड़ों को प्रभावित करती है। इसमें दर्द हल्‍का होता है लेकिन लगातार बना रहता है।
  • गाउट या गांठ: जब जोड़ों में मोनोसोडियम युरेट क्रिस्टल समाप्‍त हो जाता है तब वह गांठ वाली गठिया का रूप ले लेता है। इस बीमारी में भोजन में बदलाव जरुरी होता है और कुछ दवाओं की सहायता से कुछ दिन में आराम हो जाता है ।
  • सिडडोगाउट: यह रूमेटायड और गाउट से मिलता जुलता गठिया का प्रकार है जिसमे जोडों में कैल्शियम पाइरोफासफेट या हाइड्रोपेटाइट क्रिस्टल जमा हो जाते है।
  • सिस्टेमिक लयूपस अर्थिमेटोसस: यह एक ऑटो इम्यून बीमारी है जो जोड़ों के साथ साथ त्वचा और अन्य अंगों को प्रभावित करती है। यह बच्चे पैदा करने वाली उम्र में महिलाओं को होती है।

गठिया के लक्षण

  • जोड़ों में दर्द या अकड़न
  • जोड़ों में सूजन या फुलाव
  • चलने-फिरने या हिलने-डुलने में परेशानी
  • प्राय शुरुआत में ये लक्षण घुटनों, नितंबों, उंगलियों तथा मेरू की हड्डियों दिखते है
  • समय से इलाज न होने पर कलाइयों, कोहनियों, कंधों तथा टखनों के जोड़ों में भी ये लक्षण दिखाई पड़ने लगते है

गठिया के कारक

  • महिलाओं में एस्ट्रोजन की कमी
  • शरीर में आयरन की अधिकता
  • शरीर में कैल्सियम की अधिकता
  • पोषण की कमी
  • मोटापा
  • संक्रमण
  • ज्‍यादा शराब पीना
  • हाई ब्‍लड प्रेशर
  • किडनियों को ठीक प्रकार से काम ना करना
  • वंशानुगत

गठिया का उपचार कैसे करे?

  • गठिया के उचित उपचार के लिए चिकित्सक से जरुर परामर्श ले। चिकित्सक आपका रक्त परीक्षण और एक्स-रे करा सकते है। चिकित्सक द्वारा निर्देशित दवाइयां का नियमित रूप से सेवन करे।
  • शारीरिक वजन पर नियंत्रण रखें।
  • पौष्टिक आहार का सेवन करें।
  • चिकित्सक द्वारा निर्देशित व्यायाम या योग नियमित रूप से करें।
  • समुचित विश्राम करें।
  • आप हलकी मालिश भी कर सकते है।
  • आप हीटिंग पैड और आईस पैक का भी प्रयोग कर जोड़ों और मांसपेशियों के दर्द से बच सकते हैं।
  • आप एक्यूपंक्चर का भी सहारा ले सकते है। इस चिकित्सा में त्वचा के प्रभावित बिंदुओं पर शुद्ध सुइयों को चुभो कर गठिया के दर्द को ठीक करा जाता है।

गलसुआ(Mumps) -लक्षण ,इलाज एवम् रोकथाम के उपाय

गलगण्ड रोग  (Mumps):-यह एक  विषाणुजनित रोग है जो पैरोटिड नामक लार ग्रंथि में संक्रमण से होता है जिससे  पैरोटिड ग्रंथियों के आकार में  कष्टदायक रूप  वृद्धि हो जाती  है। ये ग्रंथियां आगे तथा कान के नीचे स्थित होती हैं तथा लार  का उत्पादन करती हैं।

Mumps

रोग का विस्तार :-

गलगण्ड एक संक्रामक रोग है जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को एक विषाणु के कारण होता है , यह विषाणु संक्रमित लार से सम्पर्क के द्वारा फैलता है। 2 से 12 वर्ष के बीच के बच्चों में संक्रमण की सबसे अधिक सम्भावना होती है।

अधिक उम्र के लोगों में, पैरोटिड ग्रंथि के अलावा, अन्य ग्रंथियां जैसे अण्डकोष, पैन्क्रियाज (अग्न्याशय) एवं स्नायु प्रणाली भी शामिल हो सकती हैं। बीमारी के विकसित होने का काल, यानि शुरुआत से लक्षण पूर्ण रूप से विकसित होने तक, 12 से 24 दिन होता है।

बीमारी के लक्षण

  1. पैरोटिड ग्रंथि में कष्टदायक सूजन आ जाती है, जो कि शुरुआत में एक ओर होती है तथा 3 से 5 दिनों में दोनों ग्रंथियों में हो जाती है। ग्रंथि की सूजन 7 से 10 दिनों में कम हो जाती है।
  2. चबाने तथा निगलने के दौरान दर्द बढ़ जाता है, एवं लार के उत्पादन में वृद्धि करने वाले खट्टे खाद्य पदार्थ एवं रस इस दर्द को और बढ़ा देते हैं।
  3. सिरदर्द होने तथा भूख कम लगने के साथ तेज़ बुखार होता है। बुखार सामान्यतः 3 से 4 दिनों में नीचे आ जाता है
  4. जब तक ग्रंथि में सूजन रहती है, ( 7 से 10 दिनों)तब  तक, पीड़ित बच्चों से अन्य व्यक्ति में भी रोग फैल सकता है। इस दौरान उसे दूसरे बच्चों से दूर रखना चाहिए एवं स्कूल जाने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।
  5. पुरुषों में अंडकोषों में दर्द एवं सूजन (ऑर्काइटिस) हो सकती है।
  6. गलगण्ड से मस्तिष्क में सूजन (एंसिफेलाइटिस) भी हो सकती है।

डॉक्टर से तुरंत सम्पर्क किया जाना चाहिए, यदि ये लक्षण हों:

  1. तीव्र सिरदर्द
  2. गर्दन में जकड़न
  3. नींद के झोंके
  4. मुर्छा आना
  5. उलटी होने पर
  6. अत्यधिक तापमान
  7. पेट दर्द
  8. अंडकोषों में सूजन

उपचार

गलगण्ड के लिए कोई विशिष्ट उपचार नहीं है। दवाइयों से विभिन्न लक्षणों में आराम मिल सकता है। आमतौर पर एंटिबायोटिक्स नहीं दी जाती हैं। बुखार को पैरासिटमॉल जैसी दवाइयों से नियंत्रित किया जाता है जो दर्द से भी राहत देती हैं। बच्चों को एस्पिरिन नहीं दी जानी चाहिए। प्रचुरता में तरल पदार्थों के साथ नर्म, हल्का आहार लेना आसान होता है। खट्टे पदार्थों एवं रसों से बचा जाना चाहिए। गलगण्ड से पीड़ित बच्चे को पूरे समय बिस्तर पर आराम करना आवश्यक नहीं है।

बचाव

गलसुआ वैक्सीन – गलगण्ड होने के बाद, व्यक्ति को कभी यह बीमारी नहीं होती है तथा उसका संक्रमण जीवन भर के लिए रोग के प्रति इम्युनिटी प्रदान कर देता है। जिन बच्चों को गलगण्ड नहीं हुआ हो, उनके इससे बचाव के लिए टीके उपलब्ध हैं। एमएमआर टीका तीन वाइरल बीमारियों– मीज़ल्स, मम्प्स एवं रुबेला (गलगण्ड, खसरा एवं हल्का खसरा) बीमारी से  सुरक्षा प्रदान करता है। यह सभी बच्चों को 15 माह की आयु में दिया जाना चाहिए। यह टीका एक साल से छोटे बच्चे को नहीं दिया जाना चाहिए और न ही बुखार से पीड़ित बच्चे तथा गर्भवती महिला को दी जानी चाहिए।

समस्याएं(Complication)

गलगण्ड कभी-कभी मस्तिष्क में संक्रमण कर सकता है (एंसिफेलाइटिस) जो कि गम्भीर स्थिति है। यदि पुरुषों में अण्डकोष प्रभावित होते हैं तो इसका परिणाम बांझपन हो सकता है।

डायबिटीज/मधुमेह के लक्षण ,निदान और जटिलताये

मधुमेह समाज में एक हिमशैल की भांति है ऐसे बहुत से लोग है जिनकी बीमारी का पता बहुत बाद में लगता है। मधुमेह के निदान के लिए उपवास हाइपरग्लाइसीमिया(Fasting Hyperglcemia) आवश्यक है।

भारत में डायबिटीज मेलिटस रोग विस्तार की दर  पिछले एक दशक में दोगुनी हो गई है। बदलती जीवनशैली, व्यायाम की कमी, गलत खान-पान, तनाव और चिंता कुछ सामान्य कारण हैं, जो मधुमेह की बीमारी का कारण बनते हैं। डायबिटीज मेलिटस के विकास में आनुवंशिक कारक प्रमुख भूमिका निभाते हैं। मल्टीपल जीन जो विभिन्न गुणसूत्रों के विभिन्न भाग पर स्थित होते हैं, टाइप 2 डायबिटीज मेलिटस के विकास के लिए जिम्मेदार होते हैं। इस विकार को उत्पन्न करने के लिए कई पर्यावरणीय कारक जीन के साथ सहभागिता करते हैं। टाइप 1 डीएम (IDDM) मधुमेह का अधिक गंभीर रूप है और 30 वर्ष की आयु से नीचे देखा जाता है, जो 10-14 वर्ष की आयु के बीच सबसे अधिक है। लेकिन टाइप 2 DM (NIDDM) मधुमेह का सबसे आम प्रकार है।

                       मधुमेह समाज में एक हिमशैल की भांति है ऐसे बहुत से लोग है जिनकी बीमारी का पता बहुत बाद में लगता है। मधुमेह के निदान के लिए उपवास हाइपरग्लाइसीमिया(Fasting Hyperglcemia) आवश्यक है। टाइप 2 डायबिटीज (T2D) के प्रबंधन में ग्लाइसेमिक नियंत्रण (ब्लड सुगर का नियंत्रण )बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिसमें पोस्टप्रांडियल ग्लूकोज की जाँच फास्टिंग  रक्त शर्करा या एचबीए 1 सी की जाँच से बेहतर मानी जाती है इसलिए, पोस्टप्रैंडियल ग्लूकोज के उतार-चढ़ाव की जाँच अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है । एरोबिक व्यायाम को T2DM को रोकने और इलाज के लिए चिकित्सकीय रूप सेमहत्वपूर्ण निर्धारित किया गया  है , क्योंकि यह मोटापे और हाइपरग्लाइसेमिक व्यक्तियों में ग्लाइसेमिक नियंत्रण और इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार करता है।

मधुमेह के प्रकार

मधुमेह अग्न्याशय  द्वारा पर्याप्त इंसुलिन का उत्पादन नहीं करने  या शरीर की कोशिकाओं द्वारा  इंसुलिन के प्रति प्रतिरोध हो जाने के कारण हो जाता है. मधुमेह के चार मुख्य प्रकार हैं:

  1. टाइप 1 डीएम:- पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन का उत्पादन अग्न्याशय में नहीं होने  की स्थिति में इस  प्रकार का मधुमेह होता है . रूप को पहले “इंसुलिन-आश्रित मधुमेह मेलाईटस” (आईडीडीएम) या “किशोर मधुमेह” के रूप में जाना जाता था। इसका कारण अज्ञात है. 
  2.  टाइप 2 डीएम:-इस स्थिति में शरीर  इंसुलिन के प्रति प्रतिरोध पैदा हो जाता है, और इस  हालत जिसमें कोशिका इंसुलिन का ठीक से प्रयोग नहीं कर पाती है। जैसे-जैसे रोग की विकाश  होता  है, इंसुलिन की कमी भी बढती जाती  है। इस प्रकार के मधुमेह को पहले “गैर इंसुलिन-आश्रित मधुमेह मेलेतुस” (एनआईडीडीएम) या “वयस्क- मधुमेह” के रूप में जाना जाता था। इसका सबसे आम कारण  शरीर का  वजन अधिक होना और पर्याप्त व्यायाम न करना है।
  3. गर्भावधि मधुमेह:- मधुमेह का  तीसरा मुख्य रूप है और तब होता है जब गर्भवती महिलाओं में उच्च रक्त शर्करा के स्तर का विकास होता है। 

मधुमेह के प्रमुख लक्षण

  • बहुत ज्यादा और बार बार प्यास लगना Polydipsia (excessive thirst)
  • बार बार पेशाब आना Polyuria (frequent urination)
  • लगातार भूख लगना Polyphagia (excessive hunger)
  • अनायास वजन कम होना Weight loss
  • अकारण थकावट महसूस होना Weakness and fatigue
  • घाव ठीक न होना या देर से घाव ठीक होना
  • बार बार पेशाब या रक्त में संक्रमण होना
  • खुजली या त्वचा रोग
  • सिरदर्द   

मधुमेह का निदान /जाँच

1.ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन (HbA1C) परीक्षण:- इस प्रकार  के रक्त परीक्षण में (Blood test) उपवास की आवश्यकता नहीं होती है । यह टेस्ट  पिछले दो से तीन महीनों में आपके औसत रक्त शर्करा के स्तर को इंगित करता है। यह लाल रक्त कोशिकाओं में ऑक्सीजन-ले जाने वाले प्रोटीन हीमोग्लोबिन से जुड़े रक्त शर्करा के प्रतिशत को मापता है।

आपके रक्त शर्करा का स्तर जितना अधिक होगा, उतना हीमोग्लोबिन आपके पास शुगर  के साथ जुड़ा होगा। दो अलग-अलग परीक्षणों पर ए 1 सी का स्तर 6.5 प्रतिशत या उससे अधिक होना दर्शाता है कि आपको मधुमेह है। 5.7 और 6.4 प्रतिशत के बीच एक ए 1 सी प्रीडाबायबिटिस का संकेत देता है। 5.7 से नीचे सामान्य माना जाता है।

यदि A1C परीक्षण के परिणाम सुसंगत नहीं हैं, या यह परीक्षण उपलब्ध नहीं है, या उस स्थिति में जिसमे A1C परीक्षण को गलत बना सकती हैं – जैसे कि आप गर्भवती हैं या हीमोग्लोबिन का एक असामान्य रूप है – तो मधुमेह का निदान करने के लिए निम्नलिखित परीक्षणों का उपयोग किया जा  सकता है:

2.रैंडम ब्लड शुगर टेस्ट(Random blood test-RBS):- इस टेस्ट में किसी भी  समय पर रक्त का नमूना लिया जा सकता है  200 milligrams per deciliter (mg/dL) या  11.1 millimoles per liter (mmol/L) या इससे अधिक रक्त शर्करा का स्तर मधुमेह का संकेत  देता है।

3.उपवास रक्त शर्करा परीक्षण(Fasting blood sugar test):- रात भर के उपवास के बाद रक्त का नमूना लिया जाता है । 100 मिलीग्राम / डीएल (5.6 मिमीओल / एल) से कम उपवास रक्त शर्करा का स्तर सामान्य है। 100 से 125 मिलीग्राम / डीएल (5.6 से 6.9 मिमीोल / एल) से उपवास रक्त शर्करा के स्तर को प्रीडायबिटिक माना जाता है। यदि यह 126 मिलीग्राम / डीएल या दो अलग-अलग परीक्षणों पर उच्च है, तो आपको मधुमेह है।

4.Oral glucose tolerance test(OGTT) :- इस परीक्षण के लिए, आप रात भर उपवास करते हैं, और उपवास रक्त शर्करा स्तर(FBS) मापा जाता है। फिर आप 75 ग्राम ग्लूकोस को पानी में मिलकर पीते है  और अगले दो घंटों के लिए रक्त शर्करा के स्तर की समय-समय पर जांच की जाती है।

140 मिलीग्राम / डीएल  से कम रक्त शर्करा का स्तर सामान्य है। दो घंटे के बाद 200 मिलीग्राम / डीएल से अधिक रक्त शर्करा मधुमेह का संकेत देता है। 140 और 199 मिलीग्राम / डीएल के बीच एक रीडिंग प्रीडायबिटिक इंगित करता है।

Complication of diabetes(जटिलताये ):-

मधुमेह कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को बढ़ाता है। सही उपचार और  जीवनशैली में बदलाव के द्वारा , मधुमेह में होने वाली  कई  जटिलताओं की शुरुआत को रोका जा सकता  हैं।मधुमेह की दीर्घकालिक जटिलताएं धीरे-धीरे विकसित होती हैं। मधुमेह में रक्त शर्करा को स्तर जितना अधिक होगा  जटिलताओं का खतरा उतना  अधिक होगा।

1.हृदय रोग:- मधुमेह नाटकीय रूप से विभिन्न हृदय संबंधी समस्याओं के जोखिम को बढ़ाता है, जिसमें निम्नलिखित प्रमुख है ।

  • सीने में दर्द (एनजाइना) और दिल का दौरा,
  • धमनियों का अकड़ना और धमनियों (एथेरोस्क्लेरोसिस) के साथ कोरोनरी धमनी की बीमारी
  • हृदय रोग या स्ट्रोक

2.तंत्रिका क्षति (न्यूरोपैथी):- उच्च रक्त शुगर शरीर की नसों को कमजोर कर देता जो शरीर में झुनझुनी, सुन्नता, जलन या दर्द का कारण बन सकता है जो आमतौर पर पैर की उंगलियों या उंगलियों पर शुरू होता है और धीरे-धीरे ऊपर की ओर फैलता है।यदि इसे अनुपचारित छोड़ दिया जाय तो , आप प्रभावित अंगों में महसूस करने की शक्ति  खो सकते हैं। पाचन से संबंधित नसों को नुकसान मतली, उल्टी, दस्त या कब्ज के साथ समस्याएं पैदा कर सकता है। पुरुषों के लिए, यह सेक्स सम्बंधित समस्याओ  का कारण बन सकता है।

3.गुर्दे की क्षति (नेफ्रोपैथी):- गुर्दे में लाखों छोटे रक्त वाहिका समूह (ग्लोमेरुली) होते हैं जो आपके रक्त से अपशिष्ट फिल्टर करते हैं। मधुमेह इस नाजुक फ़िल्टरिंग प्रणाली को नुकसान पहुंचा सकता है। गंभीर क्षति से गुर्दे के ख़राब होने की संभावना होती है  , जिसके लिए डायलिसिस या गुर्दा प्रत्यारोपण की आवश्यकता हो सकती है।

4.नेत्र क्षति (रेटिनोपैथी):- मधुमेह रेटिना (डायबिटिक रेटिनोपैथी) की रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है, जो संभवतः अंधेपन का कारण बनता  है। मधुमेह अन्य गंभीर नेत्र सम्बंधित बीमारियो , जैसे मोतियाबिंद और ग्लूकोमा के खतरे को भी बढ़ाता है।

5.पैरों की क्षति:- पैरों में तंत्रिका क्षति या पैरों में खराब रक्त प्रवाह से विभिन्न पैरों की जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। अंततः पैर के विच्छेदन का कारण बनते  है।

6.त्वचा की बीमारिया :- मधुमेह में  त्वचा की समस्याओं में वृद्धि हो जाती है , जिसमें बैक्टीरिया और फंगल संक्रमण प्रमुख  हैं।

7.श्रवण बाधित:- मधुमेह रोगी  में सुनने  की समस्याएं अधिक आम हैं।

मधुमेह का उपचार  

Effects of a single bout of aerobic exercise on oral glucose tolerance

Glycemic control  play an important  role in the management of type 2 diabetes (T2D), with postprandial glucose proposed as a better predictor of diabetes-related complications than fasting blood glucose or HbA1c. Therefore, studying postprandial blood glucose fluctuations has high physiological and clinical sinificance.

Aerobic exercise is prescribed clinically to prevent and treat T2D because it improves glycemic control and insulin sensitivity in obese and hyperglycemic individuals. Aerobic  exercise training is commonly accompanied by improvements in aerobic fitness and weight loss which independently influence glucose metabolism .

A single bout of aerobic exercise, that does not alter  body composition  or fitness of body, is sufficient to increase insulin sensitivity both in healthy , prediabetic and T2D persons. In healthy individuals, postprandial glucose tolerance has been shown to be unchanged, increased or decreased in the hours after a single bout of aerobic exercise.

In  prediabetic and T2D persons postprandial glucose tolerance after a single bout of exercise has been found to be improved in some studies while unchanged in others but a reduction of oral glucose tolerance immediately following exercise has never been found. Thus  it is found that the immediate effect of a single bout of exercise on postprandial plasma glucose levels differ between healthy and diabetic sub populations suggesting that it may be dependent on the subject’s underlying glycemic condition. Effect of single bout of exercise on plasma glucose kinetics following oral glucose ingestion would be influenced by the subject’s underlying level of oral glucose toleranc.

It is found that  the postprandial blood  glucose concentration following an oral glucose load was increased immediately following a single bout of aerobic exercise in subjects with NGT, this effect on glucose tolerance following exercise was not observed in persons with abnormal glycemic control (IGT and T2D).  The immediate effect of a single bout of aerobic exercise on oral glucose tolerance differs between healthy and diabetic subgroups, implying an impact of the underlying level of glycemic control. The exercise-induced increase in postprandial glucose response found in normal healthy persons .

Several factors may explain the lack of increase in postprandial oral glucose level found in IGT and T2D persons . 

रोजाना सुबह टहलने के फायदे

रोजाना सुबह टहलने के फायदे 

दैनिक रूप  से रोजाना सुबह टहलने के  बहुत सारे स्वास्थ्य लाभ होते हैं । इससे  आप अच्छा  तो महसूस करते  ही हैं साथ ही  आपको अच्छा दिखने में भी मदद मिलती है।

1. दैनिक सैर से दिल मजबूत और स्वस्थ रहता है।

रोजाना टहलने से हृदय रोगों के होने की संभावना को काफी कम किया जा सकता है।

एक रिसर्च में पाया गया की  रजोनिवृति (मीनोपॉज प्राप्त)  महिलाएं  जो हर दिन एक मील चलती है  उनकी  तुलना में जो महिलाएं केवल रोजमर्रा के कार्य ही करती थी, उनमें हृदय रोगों की 82 प्रतिशत अधिक  संभावनाएं पायी गई। रोज 10 हजार कदम चलना चाहिये क्योंकि ये आपके हृदय पर सकारात्मक प्रभाव डालता है और आपको कई प्रकार के रोगों से भी बचाता है।

2. जोड़ो के  दर्द छुटकारा मिलता है.

रोजाना 30 से 60 मिनट तक टहलने से  प्राकृतिक रूप से गठिये के दर्द को कम करने में सहायता मिलती  है। रोजाना टहलने से आपके जोड़ों की सूजन व कठोरता से भी राहत मिलती है। जब आप टहलना  शुरू करते हैं तो धीमी गति से शुरुवात करे  और धीरे-धीरे तेजी से व लम्बे समय तक टहलने  का प्रयास करें।

3. वजन नियंत्रण और  टाइप-2 डायबिटीज (मधुमेह) की रोकथाम में मदद करता है.

दैनिक चलने से आप धीरे-धीरे अतिरिक्त वजन को कम करने में सक्षम होंगे। यदि आप रोजाना अच्छी तरह से 30 से 45 मिनट तक चलते हैं तो आपको  टाइप-2 डायबिटीज (मधुमेह) को नियंत्रित करने में मदद मिलती है . मधुमेह की रोकथाम के लिए  एक स्वस्थ आहार के साथ साथ व्यायाम भी काफी जरूरी है।

4. हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत करने में मदद मिलती है.

टहलना आपकी मांसपेशियों को सक्रीय रखने का  सबसे शानदार तरीका है, विशेष रूप से आपके पैरों और बाहों की मांसपेशियों के लिए। ओस्टियोब्लास्ट आपकी हड्डियों की वे कोशिकायें हैं जो नई हड्डियों का निर्माण करती है। ये अतिरिक्त तनाव के लिए अच्छी तरह प्रतिक्रिया करते हैं।  सैर ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीका है।

5. उच्च रक्त रोकथाम में मदद मिलती है ।

दैनिक रूप से चलना उच्च रक्तचाप को स्वाभाविक ढंग से कम करता है। एक अध्ययन में यह पाया गया है कि एक 10 मिनट की तेज चाल उच्च रक्तचाप को कम करने में  काफी फायदेमंद हो सकती है ।सुबह सुबह 10 मिनट ,लंच के समय 10 मिनट टहलें और शाम को 10 मिनट तक टहलिये।

6. सैर करने से तनाव कम होता है।

मानसिक तनाव आज बहुत सारे व्यस्त लोगों की जिन्दगी में परेशानी बन गया है।व्यस्त लोगों की जिन्दगी में ऐसी बहुत सी चीजें होती हैं जिनसे उन्हें रोजाना निपटना होता है और पूरे दिन बस यहीं सब चलता रहता है।अनुसंधान से पता चला है कि रोजाना एक 20 से 30 मिनट की चाल, काफी हद तक मानसिक तनाव को कम करती है। यह एक औषधि की तरह काम करती है।

7. फेफड़ों की कार्यशीलता को बढ़ाती है और  अस्थमा व श्वसन रोगो से छूटकारा मिलता  है।

जिन लोगों के अस्थमा है उन लोगों के लिए भी व्यायाम एक अच्छी चीज है ,सुबह की सैर अस्थमा रोगीयों के लिए एक बेहतर विकल्प है। इसे धीरे धीरे शुरू किया जा सकता है और जैसे ही आप सहज महसूस करें आप इसे थोड़ा तेज कर सकते हैं। यह आपके वायुमार्गो को खोलेगा जिससे आपको सांस लेने में आसानी होगी।

चलने की आदत आपके फेफड़ों को मजबूत करेगी और अपके सांस लेने में सुधार करने और अस्थमा के लक्षणों को कम करने में मदद करेगी । अस्थमा रोगीयों के फेफड़ें ठण्डी हवा या गर्म हवा और वातावरण की अन्य चीजों के प्रति अधिक सवेंदनशील होते है।

8. मोटापा कम करने में मदद करता है।

मोटापा दुनिया में वर्तमान समय में एक महामारी का रूप ले लिया जिससे के काफी लोग ग्रसित है इसका कारण व्यायाम न करना है। ज्यादातर लोग अपने काम के दौरान सारा दिन बैठे ही रहते हैं ।लेकिन अगर आप समय निकालकर 30 से 40 मिनट तक सैर करते हैं तो एक महीने में आपका बहुत सारा मोटापा कम हो जायेगा। मोटापा एक ऐसी बीमारी है जो अपने साथ दूसरी खतरनाक बीमारीयों को भी न्योता देता है।

अगर आप अपनी खाने की आदतों को नहीं भी सुधारते हैं तो भी एक दैनिक सैर आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है और यह आपके शरीर से काफी केलोरी को खर्च करता है, इससे आपका जीवनकाल भी बढेगा।

9. आपके मस्तिष्क के लिए अच्छा है।

व्यायाम मस्तिष्क को स्मृति और स्पष्ट रूप से सोचने की क्षमता बढाने में मदद करता है। ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय में किये गये एक अध्ययन में पाया गया कि नियमित एरोबिक  व्यायाम मस्तिष्क में  हिप्पोकैम्पस के आकार को बढ़ा देता है।हिप्पोकैम्पस, आपके दिमाग का वह हिस्सा होता है जो सीखने तथा स्मृति की प्रक्रिया में शामिल होता है। 45 मिनट तक तेजी से चलना एक व्यायाम की तरह काम करता है जिससे आपके शरीर को काफी आक्सीजन मिलती है।

10. रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बढ़ाता है।

रोजाना घूमने से आपके शरीर की  रोग प्रतिरक्षा शक्ति बढ जाती है। हाल ही के अध्ययनों से पता चला है कि रोजाना सैर पर जाने से आपके शरीर  होने वाले बुखारों की संख्या काफी हद तक कम हो जाती है। डॉक्टरों का मानना है कि नियमित व्यायाम करनें से आपके शरीर की प्रतिरक्षा शक्ति बढ जाती है. इससे आपके शरीर की कोशिकाएं भी मजबूत बनती है जिससे किसी भी प्रकार का जीवाणु आपके शरीर में घुस नही पाता। इसलिए आपको नियमित रूप से सुबह सुबह घूमना चाहिये।

11. रचनात्मकता में वृद्धि।

अगर आप रोज सैर करते हैं तो आपकी रचनात्मक शक्ति बढेगी। यह न केवल आपके शरीर को गति प्रदान करता है बल्कि आपके दिमाग की क्रियाशीलता को भी जगाता है। रोजाना सैर से आपके शरीर से कोर्टिसोल जो आपके मूड व तनाव से जुड़ा होता है ,नामक हॉर्मोन की मात्रा कम हो जाती है। उचित व्यायाम से आपके महसूस करने के तरीके में सुधार होगा। इससे आप अपने जीवन में सकारात्मक भाव से सोचेंगे।

12. रक्त के लिपिड (कोलेस्ट्रॉल) स्तर में सुधार करता है।

व्यायाम उन एंजाइमों की क्रियाशीलता को बढ़ा देता  है जो एलडीएल (बुरा कोलेस्ट्रॉल) को रक्त से और यकृत से बाहर निकालने में मदद करते हैं।

13. केंसर के खतरे को कम करता है।

अनुसंधानों से पता चला है कि शारीरिक व्यायाम केंसर के खतरे को काफी हद तक कम करता हैं। व्यायाम से महिलाओं में स्तन केंसर का खतरा कम होता है।व्यायाम करने से खाने की नली का केंसर, यकृत कैंसर होने की संभावनाएं भी घट जाती है। व्यायाम उन हार्मोनों का स्तर कम कर देता है जो केंसर का खतरा बढाते हैं। व्यायाम आपकी पाचन शक्ति को बढाता है जिससे पेट व बड़ी आंत के केंसर का खतरा भी कम होता है।

14. निंद्रा संबंधी विकार दूर करने में मदद करता है

जो लोग रोजाना व्यायाम करते हैं उनमें नींद की समस्या कम होती है। मध्यम व्यायाम जैसे रोजाना टहलना, नींद के विभिन्न चरणों के बीच शांत संक्रमण की अनुमति देकर नींद की गुणवता में सुधार लाता है। सुबह और दोपहर के व्यायाम नींद के लिए बेहतर माने जाते  हैं। सोने के पूर्व हल्का व्यायाम आपको नींद की सबसे गहरी अवस्था में लाने और लंबे समय तक सोये रहने में मदद करता है।

Acidity or Acid reflux or Heartburn/

Acidity or Acid reflux or Heartburn

एसिडिटी या एसिड रिफ्लक्स एक बहुत ही सामान्य स्थिति है   जो मुख्य रूप से पेट या छाती (सीने) में जलन पैदा करती है , आमतौर पर जलन छाती के निचले हिस्से के आसपास महसूस होती है l पेट में अम्लीय पदार्थों का खाने की नली में आ जाना एसिडिटी का मुख्य कारण होता है l पेट में हाइड्रोक्लोरिक एसिड नामक अम्ल होता है यह भोजन को  टुकड़ों में तोड़ देता है और बैक्टीरिया जैसे रोगजन से बचाता है l पेट की अंदरूनी परत शक्तिशाली होती है जो हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के प्रति अनुकूल होती है मगर एसोफगास परतें इस अम्ल के प्रति अनुकूल नहीं होती इसलिए इसमें जलन महसूस होने लगती है l बार बार एसिडिटी की समस्या को GERD कहा जाता है l

एसिडिटी के लक्षण:-

  1. सीने में जलन:- यह ग्रास नली में एक जलन जैसी महसूस होती है  और झुकने पर और बदतर हो जाती है l यह कुछ घंटों तक लगातार हो सकती है और भोजन करने के बाद बढ़ जाती है l सीने में जलन दर्द गर्दन जा गले के अंदर तक भी महसूस होने लगता हैl कई बार पेट का अम्लीय  पदार्थ गले तक भी वापस आ जाता है जिससे जलन के साथ साथ मुंह और गले का स्वाद भी बिगड़ जाता है l
  2. अत्यधिक डकार आना और मुंह का स्वाद कड़वा पड़ना या उल्टी और पेट फूलना l
  3. लगातार सूखी खांसी आना घरघराहट,गले की समस्याएं जैसे कि गले में खराश होना या आवाज भारी होना l
  4. गले में लंबे समय से दर्द, निगलने में कठिनाई , छाती और पेट में दर्द l
  5. पेट की एसिडिटी के कारण दांतों की परत को नुकसान हो सकता है
  6. सांसो में बदबू, काला मल या मल में खून, लगातार हिचकी आना बिना किसी कारण के वजन घटना l

डॉक्टर के पास कब जाएं :- निम्न परिस्थितियां होने पर डॉक्टर के पास जाना चाहिए l

  1. अगर एसिडिटी या  पेट में जलन की समस्या अधिक गंभीर हो और बार-बार होने लगती है l
  2. निगलने में  कठिनाई या दर्द महसूस होना खासकर ठोस भोजन या गोलियां आदि निगलने में l
  3. अगर आपका वजन तेजी से घट रहा हो जिसके कारण का पता ना हो l
  4. अगर आपको काफी समय से गले में दर्द   है या गले में घुटन जैसा महसूस होता है l
  5. अगर आप दो हफ्तों से भी ज्यादा समय से एंटी एसिड दवाई ले रहे हैं लेकिन एसिडिटी की समस्या अभी भी बनी हुई है l
  6. अगर आप का स्वर बैठ गया है घरघराहट महसूस हो रही है या आपको  अस्थमा और गंभीर हो गया है तो डॉक्टर को दिखाएं l
  7. अगर आपकी बेचैनी आपकी रोजाना की जीवन शैली और गतिविधियों में बाधा डालने लगी हैl
  8. अगर आपको छाती में दर्द के साथ साथ गर्दन जबड़े टांगो या बाजू आदि में दर्द महसूस हो रहा है दर्द के साथ साथ अगर आपको सांस लेने में कठिनाई कमजोरी नाडी अनियमित होना या पसीने आने से समस्याएं हैंl
  9. अगर आपको अत्यधिक पेट में दर्द है अगर आप को दस्त की समस्या है या काले रंग का मल आता है या मल में खून आता हैl

एसिडिटी के कारण :-

  1. एसिडिटी या पेट में जलन क्यों होती है? हर किसी को कभी ना कभी एसिडिटी की  समस्या होती है आमतौर से यह खान-पान से जुड़ी होती है l
  2. गर्भावस्था में भी एसिडिटी रिफ्लेक्स हो जाता है क्योंकि इस दौरान अंदरूनी अंगों पर अतिरिक्त दबाव पड़ने लगता हैl गर्भावस्था में अधिक खाने की वजह से भी एसिडिटी हो जाती है l
  3. अधिक तले हुए खाद्य पदार्थ भी एसिडिटी का कारण बन सकते हैं ज्यादा तला हुआ खाना खाने से भी पेट की समस्या हो सकती है l तला हुआ खाना पचने में ज्यादा समय लगाता है और पेट में अधिक देर तक रहता है ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह सा भोजन को आंतों तक जाने की गति को धीमा कर देती है इससे पेट में अम्ल बनने लगता है और एसिडिटी हो जाती है l
  4. अन्य जोखिम कारक
  1. मोटापा,
  2. धूम्रपान दूसरे व्यक्ति द्वारा किया गया धूम्रपान के संपर्क में आने से,
  3. नमक का अत्यधिक सेवन ,
  4. फाइबर युक्त आहार का कम सेवन,
  5. शारीरिक व्यायाम में कमी,
  6. कुछ दवाएं जिनमें मुख्य रूप से अस्थमा की दवाइया,  दर्द निवारक,रिलेटिव और एंटीडिप्रेसेंट की दवाएं शामिल हैं,
  7. शराब या कैफीन युक्त पदार्थ पीना,
  8. जरूरत से ज्यादा भोजन करना या सोने से तुरंत पहले खाना ज्यादा खाने से पेट में ज्यादा बनने लगता है और एसिडिटी हो जाती है

एसिडिटी से बचाव :- एसिडिटी होने से कैसे रोके ?कुछ खाद्य पदार्थों और खाने की आदतों में बदलाव लाकर एसिडिटी होने से रोका जा सकता है एसिडिटी रोकने के कुछ तरीके इस प्रकार हैं l

  1. अधिक से अधिक फल और सब्जियों का सेवन करें l
  2. एक बार खाने की बजाय थोड़ा-थोड़ा भोजन कई बार करेंl
  3. रात को सोने से करीब 1 से 2 घंटा पहले भोजन करना l
  4. शरीर का स्वस्थ वजन बनाए रखना व्यायाम करना 1 दिन में करीब 3 लीटर से ज्यादा पानी पीनाl
  5. खाना खाने से 30 मिनट पहले और खाना खाने के 1 घंटे बाद तक पानी ना पीना l
  6. टाइट बेल्ट और कपड़े नहीं पहनना चाहिए l

एसिडिटी का परीक्षण :- आमतौर पर जीवनशैली में बदलाव और एसिडिटी की दवाई देने के बाद सीने  में जलन के लक्षणों में किसी प्रकार का सुधार ना होता देख कर इसका निदान हो सकता है l एसिडिटी और सीने में जलन सामान्य समस्या है और उनका निदान करना भी काफी आसान होता है l हालांकि कई बार इनके कारण निमोनिया, दिल का दौरा और अन्य साँस  संबंधी समस्याओं का भी हो सकता है निम्न प्रकार की जांच करने की आवश्यकता हो सकती हैl

  1. एंडोस्कोपी विशेष प्रकार के कैमरे से तस्वीर लेना
  2. बायोप्सी
  3. बेरियम एक्स रे
  4. एसोफगस मैनोमीटर इंसीडेंस मॉनिटरिंग

एसिडिटी का इलाज:- पेट में जलन (एसिडिटी) के उपचार में अक्सर जीवनशैली में बदलाव ,दवाई  और बहुत ही कम मामलों में सर्जरी करने की आवश्यकता पड़ती है l उसके उपचार का मुख्य उद्देश्य लक्षणों को कम करना है जीवन की गुणवत्ता को सुधारना है, इसको ठीक करना है और किसी भी प्रकार की जटिलताओं से बचाव करना l दवाई साधारणतः एंटी एसिड यह दवाई केमिस्ट के यहां मिलती हैं यह दवाई कभी कभी यह होने वाली एसिडिटी की समस्या को नियंत्रित करने के लिए काफी होती है l यह दवाई पेट में बने अम्ल को बेअसर करने का काम करती हैंl अम्ल कम करने वाली दवाई आपके पेट में बनने वाले अम्ल की मात्रा में कमी करता है lइसके  के लिए मुख्य रूप से दो दवाओं का प्रयोग किया जाता है यह दवाई लक्षणों को कम करती हैंl इन दवाओं में प्रोटोन पंप इनहीटर, हिस्टामिन टू रिसेप्टर एंटागनिस्ट, प्रोकाइनेटिक एजेंट्स lसर्जरी उपरोक्त चारों से किसी प्रकार की मदद ना मिलने या उनके कारण कोई साइड इफेक्ट होने पर सर्जरी विकल्प हो सकता हैl

जीवनशैली में बदलाव:- एसिडिटी के लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए आप पोषण के साथ-साथ  जीवन शैली में कुछ बदलाव करके भी इसके लक्षणों को मैनेज कर सकते हैं और अम्ल के उत्पादन में कमी करने के लिए एंटी एसिड व अन्य प्रकार की दवाई देना, चिंगम चबाना लेकिन वह पिपरमिंट फ्लेवर वाली नहीं होनी चाहिए l खाना खाने के करीब 2 घंटे बाद तक लेटे नहीं बिस्तर पर जाने से पहले 3 घंटे पहले खाना खा ले, जरूरत से अधिक मात्रा में भोजन ना करें, एक बार में पेट भर कर खाने की बजाय थोड़ी थोड़ी मात्रा में कई बार खा लेना एसिडिटी के लक्षणों को कम करने का अच्छा तरीका है l सोते समय अपने सिर की तरफ को पैरों की तुलना में ऊंचाई पर रखने से एसिडिटी के लक्षणों की कमी की जा सकती हैl

एसिडिटी में क्या नहीं खाना चाहिए :- सूखे मेवे जैसे मूंगफली और मीठी चीजें जैसे चीनी शहद कुछ प्रकार के मसाले , सिरका ,हरी मिर्च ,काली मिर्च, दालचीनी संसाधित खाद्य पदार्थ और संसाधित पनीर, साबुत दाल ,शराब, गैस से भरे हुए पदार्थ कैफ़ीन वाले जैसे चाय और कॉफी नींबू और संतरा आदि l

एसिडिटी में क्या खाना चाहिए :- सब्जियां जैसे हरी बींस ब्रोकली गोभी हरी पत्तेदार सब्जियां आलू जीरा अदरक दलिया पर जो खट्टे ना हो जैसे खरबूज केला सेब नाशपाती आदि अंडे का सफेद भाग स्वास्थ्यवर्धक वसा के स्रोत हैं सन के बीच जैतून का तेल और सूरजमुखी का तेलl

क्या नियमित व्यायाम कैंसर की संभावना को कम करता है ?

एरोबिक व्यायाम वह व्यायाम है जिसके लिए शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए शरीर को बहुत तेजी से रक्त पंप करना पड़ता है। एरोबिक व्यायाम में दौड़ना, नृत्य, तैराकी और लंबी पैदल यात्रा आदि शामिल हैं।

Cancer Epidemiology, Biomarkers and Prevention नामक पत्रिका ने हाल ही में एक अध्ययन किया कि दैनिक व्यायाम (daily exercise)  स्तन कैंसर होने के जोखिम को कैसे कम करता है। जिस प्रकार के व्यायाम (exercise) ने विशेष रूप से स्तन कैंसर को रोकने में मदद की, वह एरोबिक व्यायाम था। एरोबिक व्यायाम वह व्यायाम है जिसके लिए शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए शरीर को बहुत तेजी से रक्त पंप करना पड़ता है। एरोबिक व्यायाम में दौड़ना, नृत्य, तैराकी और लंबी पैदल यात्रा  आदि शामिल हैं।

एरोबिक व्यायाम  केवल कैंसर के जोखिम को ही कम नहीं करता है बल्कि  यह आपके टाइप 2 मधुमेह और हृदय रोग की संभावना को  भी कम करता है। व्यायाम करने से इन बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद मिलती है। उच्च इंसुलिन का स्तर और शरीर में वसा की उच्च मात्रा इन बीमारियों को उत्पन्न  करने वाले   जोखिमो  के महत्वपूर्ण संकेत हैं। व्यायाम आपके रक्त शर्करा को कम करता है और आपको वजन कम करने में मदद करता है जिससे ये जोखिम कारक कम हो जाते हैं।

व्यायाम आपके रोगों के जोखिम को न केवल कम करता है बल्कि यह आपके जीवन को लम्बा करने में भी मदद है! शोध से पता चलता है कि जो वयस्क रोजाना 9 घंटे या उससे अधिक समय तक बैठ कर काम करते  हैं उनकी तुलना में किसी भी तरह की सक्रिय  गतिविधि में भाग लेने वाले लोगों में अधिक लंबा जीवन होने की संभावना होती  है। लगातार सक्रियता  आपकी शरीर  की मांसपेशियों को स्वस्थ रखता है और आपके शारीर को आकार में बने रहने में मदद करने के साथ ही शरीर के  रक्त परिसंचरण में सुधार करता है!

स्वस्थ एवं संतुलित आहार बनाए रखने से भी बीमारी को रोकने में मदद मिल सकती है। डॉक्टर एक संतुलित आहार का सेवन  करने की सलाह देते हैं जिसमें स्वस्थ रहने के लिए सब्जियां, फलियां, साबुत अनाज और समुद्री भोजन शामिल हैं। संतुलित  आहार का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है कि यह कैंसर के खतरे को कम करता है, लेकिन संतुलित आहार से मोटापा कम होता है जो कैंसर का एक बड़ा कारण है। हालांकि, ब्रोकोली, फूलगोभी,  स्क्वैश, गाजर, और पालक जैसी सब्जियां खाने से स्तन कैंसर का खतरा कम होता है। आहार विशेषज्ञ भोजन में फास्ट फूड, मीठा पेय और प्रोसेस्ड मीट कम करने की सलाह देते  हैं क्योंकि वे आपके मोटापे के खतरे को बढ़ा सकते हैं जिससे कैंसर हो सकता है। रेड मीट की बजाय प्रोटीन के लिए चिकन, सीफूड और फलियां खाने वाले बच्चों को कैंसर होने की संभावना भी कम होती है।

आहार विशेषज्ञ बीमारी से बचाव के लिए और शरीर में पोषक तत्वों के स्तर को बनाये रखने के लिए अनावश्यक  पोषक तत्वों के  सप्लीमेंट्स से दूर रहने की सलाह देते हैं और इसके बजाय उन पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन करने की सलाह देते  हैं.

EFFECTS OF AEROBIC EXERCISE ON PULMONARY FUNCTION TEST AND ORAL GLUCOSE TOLERANCE IN YOUNG ADULT

Incidence of Diabetes mellitus in India becomes double in past decade. The changing lifestyle, lack of exercise, bad dietary habits, stress, strain and anxiety are some common cause which increase the incidence of diabetes mellitus causes.

Incidence of Diabetes mellitus in India becomes double in past decade. The changing lifestyle, lack of exercise, bad dietary habits, stress, strain and anxiety are some common cause which increase the incidence of diabetes mellitus causes. Genetic factors play a major role in the development of diabetes mellitus.  Multiple genes which are located on different part of different chromosomes are responsible for the development of Type 2 Diabetes mellitus. Many environmental factors interact with gene to produce this   disorder. Type1 DM (IDDM) is more severe form of diabetes and seen below 30year of age incidence is highest among 10-14year of age. But Type2 DM (NIDDM) is most common type of diabetes.

                       Diabetes is an iceberg in society. Fasting hyperglycemia is necessary for the diagnosis of diabetes, but the disease can be recognized during less overt stages by presence of glucose intolerance. There is high level of plasma glucose, lipid profile and serum uric acid among the offspring of diabetic, probably due to some genetic predisposition. Glycemic control play a very important role in the management of type 2 diabetes (T2D), with postprandial glucose proposed as a better predictor of diabetes-related complications than fasting blood glucose or HbA1c. Therefore, studying postprandial glucose fluctuations has high physiological and clinical relevance. Aerobic exercise is prescribed clinically to prevent and treat T2DM because it improves glycemic control  and insulin sensitivity in obese and hyperglycemic individuals.

                               Studies have shown that regular exercise training and good physical fitness are related to better pulmonary functions. How aerobic exercise improve patient’s quality of life, it can be understand by evaluating the relation between aerobic exercise and respiratory functions . Exercise is a type of physiologic stress in the body, and it places major demands on the cardiopulmonary system.

                                                     Exercise training is commonly accompanied by improvements in aerobic fitness and weight loss which independently influence glucose metabolism in a person. In healthy individuals, postprandial glucose tolerance has been shown to be increased, decreased or unchanged in the hours after a single bout of aerobic exercise. The immediate effect of a single bout of aerobic exercise on postprandial plasma glucose levels differ between healthy and diabetic subpopulations suggesting that it may be dependent on the subject’s underlying glycemic state.

                                       The Physical activity and exercise in all diabetic patients help in glycemic control and overall health. Specific recommendations and precautions will vary by the age, sex, activity done, type of diabetes, and presence of diabetes-related health complications. In addition to engaging in regular physical activity, all adults should be encouraged to decrease the total amount of daily sedentary time and to break up sitting time with frequent bouts of activity. Finally, behavior-change strategies can be used to promote the adoption and maintenance of lifetime physical activity

 The aerobic exercise  effects , the   Pulmonary function test and oral glucose tolerance test, in age and body mass index (BMI)‐matched groups  offspring of nondiabetics and diabetics  parents representing the normal glucose tolerance (NGT) and  impaired glucose tolerance (IGT). Thus  improving the pulmonary function of a person having impaired glucose tolerance by  aerobic exercise ,   post prandial blood sugar level also may be controlled.

Can Exercising Reduce your Risk for Disease?

There is a strong positive relation between oral glucose tolerance test and different lungs capacity and exercise.Exercise positively effect oral glucose tolerance and increases all lungs capacity which ultimately reduces the risk of diabetes and lungs diseases.

Exercise Physiology

The journal, Cancer Epidemiology, Biomarkers and Prevention,recently performed a study on how daily exercise correlates with a reduced
risk of getting breast cancer. The type of workout that specifically helped to prevent
breast cancer was aerobic exercise. Aerobic exercise is exercise that requires
the body to pump blood much faster to get enough oxygen to the body. Aerobic
exercises include running, dancing, swimming, and hiking.

But aerobic exercise doesn’t just lower your risk of cancer,
it also lowers your likelihood of type 2 diabetes and heart disease. Exercising
can help reduce the risk of these illnesses because high insulin levels and
high amounts of body fat are significant signs of risk for contracting these
diseases. Exercises lowers your blood glucose and helps you lose weight which
makes these risk factors less of an issue.

Not only can exercise reduce your risk of disease but it can
also prolong your…

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